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HISTORY OF PADDY MARKET

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साप्ताहिक बाजार का इतिहास

भारत में आजादी के बाद तकरीबन 65 फीसदी आबादी आज भी गावों और छोटे-छोटे कस्बों में रहती हैं। जब भी हम भारतीय अपनी जरूरतों की वस्तुएं खरीदने की सोचते हैं, तो हमारे जहन में सबसे पहले साप्ताहिक बाजारों का ख्याल जाता है,आज जहां बाजारों में घरों के बर्तनों से लेकर कपड़ो एवं बच्चों के मनोरंजन की चीज़ों तक का विशेष ध्यान रखा जाता है और साथ ही स्त्रियों के कॉस्मेटिक आइटम्स से लेकर बुज़र्गों की जरूरतों के सामान भी उपलब्ध होते है। यदि कोई त्यौहार नजदीक आ रहा हो तो माँ उस त्यौहार से जुडी सामानों की लिस्ट पहले से तैयार रखती है, जो घर के आस-पास लगने वाले साप्ताहिक बाजार से खरीद जा सके।

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चाहे सोमबाजार हो या घर के दूसरी तरफ लगने वाला बुधबाजार या अन्य कोई बाजार ,जहां पर सभी जरूरत का सामान आसानी से मिल जाता है। यदि हम लोग इन साप्ताहिक बाजारों के व्यापारियों की दैनिक -ज़िंदगी पर नजर मारे तो हम देखेंगे कि ये लोग सुबह से ही अपने व्यापार को संभालने के लिए अपने -अपने घरों से निकल जाते है चाहे वो मंडी से सब्जियों व फलों को लाना हो या थोक विक्रेता की दुकानों से कपड़े लाने हो और उस के बाद ये लोग दोहपर में बाजार में पहुंच कर अपनी अपनी जगह पर दुकानों के ढांचे खड़े करते है ,जो इतने आसान भी नहीं होते। यदि बात साप्ताहिक बाजारों की चली है तो आइए जानते है साप्ताहिक बाजार के इतिहास के बारे में भारत में साप्ताहिक बाजारों का इतिहास तो प्राचीन काल से चलता आया है, ये भारत में आज और कल से लगने शुरु नहीं हुए, जिसका जिक्र पौराणिक कथाओं में भी मिलता है यदि उस वक्त की और नजर मारें तो हम देखेंगे कि उस काल में राजा-रजवाड़ों का शासन हुआ करता था, जो अपनी प्रजा को सुख-दुख में साथ रखते थे। उस समय में साप्ताहिक बाजारों को ‘हाट’ के नाम से जाना जाता था, जो आज भी यू-पी के अधिकत्तर गांव में ‘हाट’ या ‘पेन्ट’ के नाम से पुकारा जाता हैं इसी तरह साउथ इंडिया के तमिलनाडु में इन्हें ‘अलवरपेट’ और सैदापेट’ के नाम से जाना जाता रहा है और भारत के अलग-अलग राज्यों में इन्हें अपनी भाषाओं के हिसाब से नाम दिये जाते हैं जब कोई बाजार आदि-वासियों के क्षेत्रों मेें लगते थे उस समय तो मुद्रा का कोई अंश भी नहीं था, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों के लोग एक-दूसरे को अपनी जरूरतों की चीजों का आदान-प्रदान करते हुए अपना जीवनयापन कर रहे थे।

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जैसे-जैसे भारत के क्षेत्रों का विकास होने लगा वैसे ही आदिवासी क्षेत्र पिछड़ने लगे जिस कारण वह लोग कस्बों और शहरों से कई कोसो दूर पीछे रह गए और जब साप्ताहिक बाजार शहरों में लगने शुरु हुए तो उस समय व्यापारियों की कुछ श्रेणियों में कारोबार हुआ करता था जैसे कि मसाले, अनाज- दालें, अचार, फल – सब्जियां एव पुराने बर्तन इस तरह के वस्तुओ का अधिकत्तर व्यापार किया जाता था उस समय से लेकर आज तक साप्ताहिक बाजार के दुकानदार बड़ी बेसब्री से शाम होने का इंतजार करते हैं, जिससे कि वह अपनी दुकानों के ढ़ांचे को खड़ा कर सके चाहे वो पांच या छः घंटें के लिए क्यों ना हो ये साप्ताहिक बाजारों के दुकानदारों का रोज का एक कार्य बन जाता है क्योंकि बाजार तो सोमवार से रविवार तक लगते हैं इसलिए वह इसे अपनी आमदनी ना सोचकर अपने जीवन का एक हिस्सा मान लेते हैं, जिस वजह से वह बाजारों में आकर अजनबियों के साथ एक मित्रता का रिश्ता भी कायम करते हैं, जो उन्हें बाजार लगाने में भी मदद मिलती है लेकिन आज भी कुछ क्षेत्रें में साप्ताहिक बाजार अपने ही अंदाज में लगते हैं जिसमें सामानों के लेन-देन से ही जरूरतों की चीजें खरीद ली जाती हैं, यदि हम लोग साप्ताहिक बाजारें को विदेशों में लगते देखें तो वहां का स्वरूप कुछ और ही दिखाई पड़ता है जैसे की एक व्यवस्थित रूप से उन्हें लगाया जाता है वहां पर सरकारों ने इन बाज़ारो को एक नियम अनुसार और दुकानदारों को शिक्षित करते हुए बाजार लगाने की अनुमति दी हुई है, जो भारत के शहरों वाले साप्ताहिक बाजार के विपरित दिखाई देती है। जहां शासन एवं प्रशासन का कुछ खास कार्य इसमें शामिल नहीं दिखाई पड़ता आज देखा जाए तो भारत डिजिटल इंडिया का मुकाम प्राप्त करने की और चल रहा है लेकिन इन साप्ताहिक बाजारों की हालात आज भी वैसी की वैसी है और इतने वर्षों की बाद भी ये साप्ताहिक बाजार के दुकानदार अपनी ठोस पहचान नहीं बना सके।